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‘घूम अकेला’| राकेश तिवारी | Travel Alone | Rakesh Tiwari

घूम अकेला

अकेले घूमने के लिए व्यक्ति में कुदरती तरंग और अनदेखा देखने की तलब सबसे जरूरी हैं। बाकी की सब बातें उसके बाद ही आती हैं। रोमांच, जीवट और संकट से खेलने की ललक, प्राकृतिक-सौंदर्य, भांति-भांति के भू-भाग, पहाड़-मैदान, लोग, भाषा-बोली, रिवाज, लोक-परंपरा आदि में रुचियों तथा अपनी अपनी क्षमता के अनुसार आप कहीं भी घूम सकते हैं! जितना साध सकें उतना ही घूमने का मंसूबा बांधें, असाध्य साधने के फेर में कभी न पड़ें।

जिनके पखने बड़े-बड़े हों, मतलब जो बिना साधनों के ही दुनिया भर में घूम सकते हैं वो वैसे घूमें, कुछ भी खा-पीकर कहीं भी पड़कर सो लेने वाले फकड्डों की तरह मांगते-जुटाते घूमने वाले भी मिल जाएंगे। इस वर्ग के घुमक्कड़ों की तैयारियों और यात्रा में अपेक्षित सावधानियों के बारे में बताने की कोई आवश्यकता नहीं। उनके गंतव्य और अभियान की दिशा-दशा उनकी मौज और सामथ्र्य के अनुरूप ढलती चलती है। उदाहरण के लिए ऐसे विलक्षण घुमक्कड़ों में से काबिले जिक्र हैं – प्राचीन काल में चीन से हिन्द आने वाले मशहूर यात्री फाहियान-ह्वेन त्सांग-इत्सिंग, उत्तरी अफ्रीका में टिम्बक-टू से चलकर ताजिंदगी एशिया के अनेक देशों का सफर करने वाले इब्न-ए-बतूता (‘पहन के जूता’) और अपने मुल्क में इसी शताब्दी में हो गए इतने ही विलक्षण ‘घुमक्कड-राज महापंडित राहुल बाबा’ और ‘महातीर्थ के अंतिम यात्री’ के लेखक बिमल डे’। इस संदर्भ में एक बीहड़ अमरीकी पत्रकार की चर्चा किए बिना बात अधूरी ही रह जाएगी। इक्यावन साल की उम्र में पॉल सालोपेक नामक ये घुमक्कड़ २०१३ में पैदल-पैदल निकल पड़े-अफ्रीका (इथोपिआ) से बीस हजार मील (छत्तीस हजार किलोमीटर) से भी लम्बा रास्ता नापने, प्राचीन काल में अफ्रीका से यूरोप-एशिया-उत्तरी अमरीका से दक्षिण अमरीका के दक्षिणी ध्रुव तक पहुंचे प्रथम मानवों के प्रजजन-मार्ग पर पड़े पदचिन्हों पर चलते हुए। अब तक वे चीन तक का  रास्ता चल चुके हैं, ‘चलना है अभी उन्हें मीलों दूर मीलों दूर’। ‘आउट ऑफ एडेन नाम से मशहूर इस यात्रा के बारे में गूगल पर ढेरों सामग्री भरी पड़ी है। ये यात्री अपने अभियानों पूरी तरह अकेले तो नहीं अंजाम दिए, मगर जिगरा और पैर अकेले उन्हीं के रहे, अपनी धुन में घर से निकल पड़े अकेले, रास्ते में किसी का साथ मिला तो साथ लिए वर्ना अकेले ही चलते रहे।

विलक्षण घुमक्कड़ों के वर्ग में न आने वालों के लिए भी अकेले घूमना बहुत मुश्किल नहीं। अपनी सुविधानुसार वे भी एकल-फिरंदरी के आनंद लूट सकते हैं। उनकी यात्राओं को तुलनात्मक रूप से सहज, सुगम्य और सुरक्षित बनाने के लिए कुछ सुझाव दिए जा सकते हैं। मगर उन्हें भी ‘राहुल बाबा’ की ‘परदेश कलेश नरेशहु को’ वाली सीख हमेशा याद रखनी चाहिए। जब जिधर दिल बहका उधर ही बह जाने वालों को अधिक नहीं फिर भी इतनी सलाह दी जा सकती है कि घर से निकलने से पहले देश-दुनिया के भूगोल, वातावरण, सामाजिक-राजनीतिक-धार्मिक स्थितियों की सामान्य जानकारी हासिल कर लेना उपयोगी रहेगा। योजना बनाकर निकलने वालों को भी गंतव्य एवं रास्ते के संदर्भ में ऐसी जानकारियां प्राप्त कर लेना सदैव लाभदायक रहेगा। आज के समय में देश-विदेश में अकेले घूमने वाले-वालियां अपने यात्रा-संस्मरण सोशल मीडिया (विशेषतः फेसबुक) खूब लिख रहे हैं। इनमें शामिल प्रवीण वाधवा, केशव भट्ट, ललित शर्मा, नीरज मुसाफिर, अलका कौशिक, अनुराधा बेनीवाल वगैरह की लिस्ट बहुत लम्बी है। इनके वृत्तांत पढ़कर ऐसी यात्राओं की तैयारी और सावधानियों के विषय में प्राथमिक व्यवहारिक ज्ञान आसानी से जुटाया जा सकता है। इतनी तैयारी के बाद भी जरूरी नहीं कि इसी के भरोसे सब समस्याओं से निपट लेंगे, यात्राओं में कई बार ऐसी स्थितियों से वास्ता पड़ेगा जिनका निस्तारण आपको उसी समय की सूझ-बूझ से ही करना होगा।

पहली बार अकेले घूमने निकलने वालों को पहला सबक मिल सकता है उस वाकये से जो पहली बार ट्रेकिंग पर निकलने पर नौसिखिया होने की वजह से मैंने झेला। एक बार यूं ही धुन चढ़ी पहाड़ घूमने का। रुक-सक में ठूंस लिया भरपूर सामान, ऊपर से टू-मेन टेंट, ट्रेकिंग-स्टिक, ट्रेकिंग बूट्स और जो-जो समझ में आया सब का सब। देहरादून में ट्रेन से उतरकर सारे  सामन का बोझा लादकर बड़े ताव से निकल पड़े सहस्र-धारा हो कर मसूरी की ओर। कुल जमा दो किलोमीटर चलने में ही चूलें हिल गयीं। उसके बाद बोध हुआ आगे के सफर के लिए ‘मोटर-गाडी शरणं गच्छामि’ का। मसूरी पहुंचकर सोचा फालतू सामान वहीं कहीं छोड़कर आगे चलेंगे मगर पता करने पर पता चला ‘डोडी ताल’ जहां जाने का मंसूबा बनाया है वहां तो इस मौसम में बर्फ पड़ी है और रास्ता बंद। मुंह लटकाकर ‘घर के बुद्धू घर को आए’। आगे के लिए बड़ी काम की सीख पाकर। घूमने निकलिए वो भी अकेले तो पहली फिक्र करनी चाहिए पिट्ठू के वजन की। यूं समझिए कि एक आलपीन भी फालतू नहीं रखनी चाहिए। दो जोड़ी कपडे, अंगौछा, टार्च, मोमबत्ती माचिस, थोड़े से सूखे मेवे, गुड़-चना, पानी की छोटी बोतल और जरूरी दवाइयां, बस इतना ही। चौखट से बाहर कदम धरने से पहले जरूर जान लीजिए – कहां जाना है, रास्ता कैसा और वहां का मौसम कैसा रहता है। वरना आपका भी वही हाल हो सकता है जैसा अपन का हुआ।

जो सामान साथ लेने की सलाह ऊपर दी गयी है उसमें अपना दिमाग भिडाक़र मौसम के हिसाब से गरम या ठंढे लिबास और ‘स्लीपिंग बैग’ जैसे नग बढाऩे या घटाने का जिम्मा आपका होगा। जरूरी नहीं कि टेंट लगाकर ही डेरा डालें। पहले से पता करके चलें रास्ते में होम-स्टे कहां-कहां हो सकता है या मौके पर पूछताछ करके मालूम कर लें। जहां इसका चलन नहीं वहां ग्राम-प्रधान या स्कूल-मास्टर से संपर्क करके जगह पाने में आसानी होगी। वैसे भी निकलने वालों को कहीं न कहीं सिर छुपाने की जगह मिल जाती है। अंदरूनी इलाकों के ज्यादातर ग्रामीण-जन अभी भी लोग इतनी मदद के लिए हाथ बढाऩे, खिलाने पिलाने की दरियादिली दिखाते मिल जाएंगे। कुछ न मिले तो कहीं भी पड़ रहिए ‘करतल भिक्षा तरुतल वास’ करते हुए। ऐसी स्थितियों में सुरक्षा के नजरिए से अच्छे-बुरे का अनुमान घूमने वालों / वालियों की सामान्य-बुद्धि और छठी इन्द्रिय पर निर्भर करेगा। वैसे जहां तक हो सके गंतव्य के इलाके में ‘लॉ एंड आर्डर’ की जानकारी पहले से कर लेना अच्छा रहता है। इसके अलावा निकलने से पहले थोडा ़सा पैदल चलने का अभ्यास बाद में आरामदायक होता है। गांठ की पूंजी के अनुपात में अभियान पर संभावित खर्चे का मोटा-मोटी अनुमान भी लगाना ही होगा। भोजन के मामले में सामिष-निरामिष दोनों हों तब तो क्या ही कहने, दुनिया आपकी मुट्ठी में, निकल पड़िए धरती नापने, ‘दुनिया बेकरार है आपके खैर-मकदम के लिए’।

‘एकला चलने वालों’ को तन्हाई का मजा लेने की आदत डालनी चाहिए। तन्हाई में कोई तन्हा नहीं रहता। बहुत कुछ होता है उसके साथ आस-पास, बाहर-भीतर। तन्हा घूमने वाले – देख पाते हैं विश्व-रूप, धरती-आसमान, तिरते बादल, पहाड़-रेगिस्तान के विस्तार, तरह तरह के लोगों के चलन-व्यवहार, मौन ही मौन प्रकृति और अपने आप से बतियाते, बीते कल की यादों और आने वाले कल की कल्पनाओं में  खोए, डूबते-उतराते हैं प्रेम में-विषाद में-सुख-दुःख में, गुनते हैं अपने आप को, संजो लेते है घनी तन्हाई में एक से अनेक हो जाने के, संवेदित भावों में भिन कर बुनते बोल, अनुभव-अक्स। यह सब लिखने के लिए अकेले में जैसी एकाग्रता सध जाती है आम तौर पर किसी के साथ या समूह में चलने पर नहीं। साथियों के साथ घूमने-चलने में ज्यादा वक्त उनसे बात करने में किसी एक जगह उस तरह गौर नहीं कर पाते। घूमने की सबसे बड़ी कमाई होती हैं स्मृतियां – खट्टे-मीठे तजुर्बांे, खूबसूरत मोहक नजारों, तरह तरह के लोगों, पोशाकों, वनों, नदियों कगारों, पर्वत, कूल-किनारों के खजानों जैसी। मनभावन नजारे दर्ज कर सकते हैं अच्छे कैमरे या अब तो हर हाथ हाजिर मोबाइल में, हां! इसके लिए पावर-बैंक और बैक-अप का इंतजाम पक्का रखिए। बकिया सब चलते-चलते या रात में सोने से पहले डायरी में लिख डालिए नहीं तो समय बीतने के बाद यादें धूमिल होने लगती हैं। ये नोट्स बाद में सफ़रनामा लिखने में बड़े काम आते हैं, जिन्हें ऐसे वृत्तांत लिखने में दिलचस्पी नहीं वे जीवन भर उन तस्वीरों और डायरी में लिखा, पढ़कर पुरानी घुमाई की मधुर-स्मृतियों में जीने का रस पा सकते हैं।

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राकेश तिवारी

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