भीमबेटका – पत्थर युग के बुतों का फसाना
भोपाल के पास विश्व धरोहर भीमबेटका के रॉक-शेल्टर और रॉक-पेंटिंग्स प्रागैतिहासिक प्रस्तर युग के मानव की चालीस-पचास हजार साल पुरानी जिंदगी की दिलचस्प दास्तान हैं।
पुरातत्व के पन्नों में इंसानी सभ्यता का थ्रिल है भीमबेटका। भोपाल के दक्षिण में 45 किलोमीटर दूर विंध्याचल की पर्वत-श्रृंखलाओं की तलहटी के घने जंगलों में पहाड़ी गुफाओं का जंजाल। भीमबेटका की सर्पिल पथरीली चट्टानों के खुरदरे खुश्क चेहरे पर दर्ज रंगीन लकीरें इंसानों की चालीस-पचास हजार साल पुरानी जिंदगी की दिलचस्प दास्तान। ये चट्टानें घड़ी की टिक-टिक के साथ बहते ‘समय’ का पुरावा हैं, जो वक्त के सिरों को जोड़कर पत्थर-युग को वर्तमान के रूबरू खडा ़कर देती हैं। भीमबेटका के पहाड़ों में कोई 750 रॉक-पेंटिंग्स हैं, जिनके अक्स में 40000 से एक लाख साल या इससे भी पुरानी साल पुराने पाषाण-युग की जुझारू जिंदगी का सिलसिला दर्ज है। यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर माना है।
भीमबेटका हमारे आदि-मानवों की दहशतों को बयां करता है और उनकी अनिश्चितताओं को उकेरता है। आदिम-युग में हमारे पूर्वज महज शिकारी थे। जानवरों का शिकार उनके जीने का सहारा था, उनका मांस खाना था और मृत जानवरों का चमडा ़उनका कपडा।़ घने जंगल, पहाड़ों की चट्टानी गुफाएं उनकी जिंदगी का आसरा थीं और नुकीले पत्थर हथियार। इतिहास के पन्नों की तरह ये चट्टानें भी इंसानों से बातें तो करती ही हैं, ज्ञात इतिहास में दर्ज काल-खंडों के उस पार ‘अंधे-समय’ की गुमशुदा दुनिया का अक्स उकेरने के लिए अज्ञानता का संधान करतीं ‘हायपोथीसिस’ को आकाश भी देती हैं।
भीमबेटका के रॉक-शेल्टर (शैलाश्रय) और रॉक-पेंटिंग्स (शैलचित्र) की आदिम-रहस्यात्मकता जितना ही थ्रिल उसकी खोज की तथा-कथा में भी है, जिसे स्वर्गीय डॉ‧ विष्णु श्रीधर वाकणकर ने 1957-58 में अंजाम दिया था। मध्य प्रदेश में यह कहानी सौ साल पहले शुरू हुई थी। एक अंग्रेज सीके एंडरसन ने 1921 में होशंगाबाद के पास आजमगढ़ में पहली रॉक-पेंटिंग्स का पता लगाया था। बियाबान बीहड़ों में रॉक-पेंटिंग्स और रॉक-शेल्टर की खोज, गुफाओं की छतों और दीवारों पर अनाम आदिम चितेरों की रंगीन कल्पनाओं के रूपांकन का पुरातत्वीय और सांस्कृतिक अध्ययन दुष्कर माना जाता है। ज्यादातर पुरावेत्ता अभी भी रॉक-शेल्टर में चट्टानों से जूझने के बनिस्बत सभ्यताओं की तलाश में जमीन की खुदाई या पुराने किलों का रख-रखाव मुफीद मानते हैं। यह कहानी छठे दशक की है, जब डॉ‧ वाकणकर कई दीवानों के साथ शैलाश्रय और शैल-चित्रों की खोज को मिशन बनाकर पहाड़ों के बियाबान जंगलों में निकल पड़े थे। इन खोजियों के बारे में लोग कहते थे कि ‘ये पागल हैं, जो खजाने की खोज मे भटक रहे हैं।’ उन दिनों रॉक-पेंटिंग्स और रॉक-शेल्टर की पहचान पुरातत्व की धरोहर के रूप में नहीं होती थी। गांवों के चरवाहों और लकड़हारे शैल-चित्रों को जादू-टोने और टोटके के रूप में देखते थे। बुंदेलखंड में इन्हें पुतरिया कहा जाता था, क्योंकि गुफाएं रंगीन चित्रों से पुती हुई थीं। दोपहर में चरवाहे वहां आराम फरमाते थे। कुछ लोग इन्हें चुड़ैल का ठिकाना मानते थे। उनकी धारणा थी कि जादू-टोना करने वाले कपालियों ने प्रेतात्माओं को जगाने के लिए इन्हें बनाया है। भोले-भाले ग्रामीण मानते थे कि साधु के शाप से कोई बारात चित्रों में बदलकर गुफा की दीवारों पर चिपक गई है। एक मान्यता यह भी थी कि सीताजी ने वनवास के समय इन चित्रों को बनाया था।
आदि-मानव का जिंदगीनामा
किंवदंतियों के बीच डॉ‧ वाकणकर ने भीमबेटका की खोज करके मानव-सभ्यता के विकास की थीसिस के पुनरावलोकन को नए आयाम दिए हैं। ये रॉक-पेंटिंग्स पहाड़ों की पथरीली गुफाओं के गहरे अंधेरों में आसरा पाने वाले आदि-मानव का जिंदगीनामा है। मध्य पाषाण काल से लेकर ऐतिहासिक काल के दरम्यान आदि-मानव की विकास-गाथा का हिस्सा। उम्रदराज इंसानी चेहरे की झुर्रियों की तरह इन चट्टानों के खुरदरे चेहरें की झुर्रियां भी बीती सहस्त्राब्दियों का अक्स है। ये रॉक-शेल्टर मानव की बसाहटों के इतिहास का पहला दस्तावेज हैं और जंगली जानवरों के शिकार से लेकर कृषि-युग की कहानी को बंया करते हैं।
भीमबेटका के शैलाश्रय मध्य भारतीय पठार के दक्षिणी किनारे पर विंध्य पर्वत की तलहटी में सात पहाड़ियों के बीच 10 किलोमीटर के दायरे में फैले हैं। भोपाल-होशंगाबाद राजमार्ग पर विशाल बलुआ पत्थर की चट्टानों के भीतर पांच शैलाश्रयों की चट्टानों पर 750 ज्यादा रॉक-पेंटिंग्स नजर आती हैं। 30000 साल पुराने शैल-चित्र पुरापाषाण – आदि मानवों से सीधे जुड़े हैं – उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का दस्तावेज, जिसमें रोजमर्रा के सरोकारों के इर्द-गिर्द घूमती उनकी जीवन शैली, जिंदगी के संघर्षों और धर्म-कर्म के विभिन्न पहलूओं की सुनिश्चित झलक मिलती है। गुफाओं के विशाल खंडहरनुमा खुरदरे खूबसूरत कैनवस पर सुक्ष्म वनस्पतियों के रंगों में हमारे पूर्वज आदि-मानव का खूबसूरत आदिम-संसार समग्रता के साथ मौजूद हैं। गुफाओं में आदि-मानव द्वारा प्रयुक्त औजारों और हथियारों की कलाकृतियां भी मौजूद हैं। शैल-चित्रों में तीर-तलवार, धनुष-बाणों व भालों के साथ हाथी-घोड़ों पर सवार योद्धाओं के शक्ल में ऐतिहासिक और मध्यकालीन युग के शास्त्रोक्त-युद्ध के दृश्य इस समग्रता की पुष्टि करते हैं। इन चित्रों में आदि-मानव के सपनों का रेखांकन भी है और उनकी भयातुर जिंदगी के दहशतों का दर्दांकन भी। उनमें वृक्षों के आस-पास आदि-मानव के नृत्य प्रकृति की पूजा की प्रवृतियों को उजागर करते हैं। ये वृक्ष देवताओं के धार्मिक प्रतीकों के परिचायक हैं।
रॉक-पेंटिंग्स में खाना पकाकर खाने-पीने और नाचने-गाने के दृश्य भी हैं और जानवरों के शिकार की कहानियां भी। जिंदगी के संघर्षों को अलग-अलग तरीके से उकेरा गया है। एक गुफा में एक आदमी पर हमलावर विशाल लाल बाइसन का चित्रांकन भी है, जहां शिकारी खुद शिकार होने के कगार पर खडा ़नजर आता है। रॉक-पेंटिंग्स में गैंडे, बाघ, जंगली भैंसा, भालू, सुअर, मृग, शेर, हाथी और छिपकली जैसे जानवरों के रंगीन चित्र बहुतायत में उपलब्ध हैं। हाथी-घोड़े, मृग और बायसन सहित विभिन्न किस्म के जानवरों के भित्ति चित्र आदि-मानव को प्रकृति और पर्यावरण के साथ जोड़ते हैं। सामूहिक शिकार के चित्र आदि-मानव की परस्पर-निर्भरता के प्रतीकात्मक रेखांकन है। इनमें वाद्य यंत्रो के साथ सामूहिक नृत्य और उत्सव के जरिए सामाजिक-बोध की धारणाओं के विस्तार का सिलसिला भी नजर आता है। रॉक-पेंटिंग्स के निर्माण मे प्रयुक्त रंग और उनके इस्तेमाल की तकनीक इन शैल-चित्रों की विषय-वस्तु से ज्यादा कौतूहल पैदा करती है। लकीरों में कलात्मक लोच है। बहुतायत पेंटिंग्स में सरल रेखाओं के साथ लाल और सफेद रंगों का उपयोग किया गया है – कहीं-कहीं हरे और पीले रंगों के साथ।
हमारे पूर्वजों की जिजीविषा, उम्मीदें और दहशतों से भरी जिंदगी के रंग भीमबेटका के पहाड़ी गलियारों की खूबसूरत चट्टानी दीर्घाओं में आज भी पूरे सुरूर और गरूर के साथ मौजूद हैं। मेंगनीज, हेमेलाइट, लकड़ू के कोयले और जानवरों की चर्बी से प्राप्त प्राकृतिक वानस्पतिक रंग-द्रव्यों और सूक्ष्म वनस्पति रंगो के इस्तेमाल से बनी ये रॉक-पेंटिंग्स समय की मार झेलते हुए आज भी अपनी पूरी रौनक में हैं और हमें खुद के भीतर झांकने के लिए मजबूर कर रही हैं।
उमेश त्रिवेदी
